‘ प्रधानी’ अवधि कबिता

Logo २४ असार २०७८, बिहीबार १५:२४ | Aadil Times                  

अवधि कबिता –
१०- कबिता शिर्षक- ‘ प्रधानी’
लेखक – राकेश कुमार यादव
पेशा – अध्यापक
ठेगान – रोहिणी-७, रूपन्देही (नेपाल)
२०७८-०३-१५
मारझिझोर कहाँ कुछ रहिगा, तंगी बहुत किसानी में |
अबकिर कहतेव घुरहु काका, लडित पंच प्रधानीमें ||
(१)
काम धाम की ऐसी तैसी , ताली भर सुनित बजावेक है |
माईके साडी, दादाके बोतल, भरल गाँव पहुचावेक है || जश्न जीत प्रिय पैसा पर है , फेंकित पैसा पानी में ||
अबकिर……. ………… ………..
(२)
सबका मत बहकावे खातिर, खुब ऊंच नीच बतियावेक है |
केहु केतनो कुछ उल्टा बोली, सब गुटुर २ सहिजावेक है ||
जज्बात सुनित अटका देला, जब फंसत है अंगुरी चानी में ||
अबकिर…………. ……….
(३)
चौराहा पर टहल घुम सब, चाय में चर्चा बिनित है |
शंका के जिन बात करा, हम घरे घरे नर चिन्हित है ||
दुनियाँपे एक भौकाल बदे, हम जोडित हाथ जवानी में ||
अबकिर……….. ………… ………
(४)
राजनीतिकै खेल निर्दयी, लागय देश डुबा देइ |
भ्रष्टाचार भयंकर उभरल, उठत मनुजता खा लेइ ||
झूठ, बुराई,हत्या, हिंसा हिचकोरय बेइमानी में ||
अबकिर…. …………. …
••••••••••••• समाप्त•••••••••••••

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